मानव, जाति और धर्म

मानव ,जाति और धर्म

हम यदि पाषाण काल की बात करे तो इतिहास में हिन्दू ,मुस्लिम और ना ही कोई और धर्म किसी के बारे में कोई जानकारी नहीं है । पाषाण काल में मानव तो मानव जैसा भी नहीं था तब को एक पशु कि भांति था इसीलिए तो हमें यह बताया जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर प्रजाति के थे । आज का मानव जो आज जाति,धर्म की बात करता है तब उसे ये नहीं पता था कि वह की जाति या धर्म का है ।जब शुरू में ऐसी कोई धारणा नहीं थी तो इसकी उत्पत्ति हुई कहा से ? यदि हम उसके आगे मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल की भी बात करे तो हमें तब भी यह नहीं देखने को नहीं मिलेगा कि उस समय कोई धर्म या जाति थी । इस काल में भी थोड़ा अभी थोड़ा बहुत सभ्य हुआ था इतना नहीं की वह जाति और धर्म देखने लगा था। 

यहां से आगे बड़े तो हम वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में अचानक मिलेगा की इस समय लोग अपने व्यवसाय के अनुसार जाने , जाने लगे ।उस समय भी ये सही था कि काम के अनुसार मानव को एक पहचान मिल गई लेकिन ये तो नहीं था कि उसकी आने वंश भी उसी व्यवसाय और जाति का हो जाएगा । उत्तर वैदिक काल की बात करे तो इसमें लोगो का व्यवसाय उनकी जाति पर आधारित हो पर हुआ कैसे ? 

हम देखेंगे की वैदिक काल में विदेशी लोग जो इस धरती पर आकर बस गए जो अपने आर्यावर्त अर्थात् आर्य देश के निवासी थे । उनका चाल चलन हमारे यहां की सभ्य संस्कृति से बहुत अलग थी वो मांस मदिरा आदि प्रवृत्ति को नष्ट करने वाली चीजों का उपयोग करते थे । ये ऐसी वस्तुएं थी जो हमारी सस्कृति को एक नए दौर में लाई और पूरी वयवस्था को उलट दी ।

इसने लोगो के बीच विभेद पैदा कर दिया ऊंच -नीच , छुआ- छूत आदि ऐसी बहुत सी वैमनस्य व्यवहारों को भर दिया ।

लोगो को धर्म ,जातियों ,अमीर ,गरीब अनेक विदंभनाओ में बांट दिया । ये सिर्फ और सिर्फ आपने स्वार्थ के लिए ऐसा करते रहे और कमजोर लोगो बेबस और लाचार बनाते गए । 

अगर हम सिंधु सभ्यता की बात करे तो वहां भी ऐसा बंटवारा नहीं था इस काल में भी लोगो व्यवसायों के आधार पर जाना जाता था ।

जब इतना सब कुछ हम जानते है तो भी हम दूसरो द्वारा बनाई गई बर्बर पद्धति को अपने हुए है जो हमेशा से लोगों को दो वर्ग बांटती आयी है ।

अच्छा चलो मानते है कि अब इस पद्धति को मिटाना मुश्किल है लेकिन ये तो नहीं इसकी बुराइयों को समाप्त नहीं कर सकते है हम देख सकते है इसमें अनेक बुराइयों समाप्त किया गया है जैसे सति प्रथा ,बाल - विवाह अनेक बुराइयां समाप्त हुई है ।जब ये सब हुई है तो इस पद्धति और सुधार किया जा सकता है ।

आज का समय धर्म और जाति को लेकर बहुत संवेदनशील है वह तुरंत मारने और मारने को तैयार हो जाता है जबकि ये कोई हल नहीं है इसमें हमेशा जान माल का नुक़सान ही होता है । अब अच्छा बताओ अगर धर्म ना होता तो हमारे देश के आज दो टुकड़े होते , नहीं होते । गुजरात जैसे अनेक दंगे होते , नहीं होते ।

अभी हाल ही की बात करो दिल्ली में दंगा हुआ उसका कारण क्या था यही तो था धर्म सिर्फ और धर्म ।

धर्म की आड़ में बड़े बड़े नेता , व्यापारी और उच्च वर्ग अपना फायदा कर लेता है और धर्म और जाति के प्रति संवदनशील गरीब जनता जिसको ये लगने लगता है अब तो जीना ही मुश्किल हो गया है वो कूद पड़ती है और अपना और अपनों का नुक़सान करती है । ऐसे तमाम उदाहरण है महाराष्ट्र को ही लेलो जाति को लेकर हुए दंगे में कितने लोग मरे , असम इसमें से अलग थोड़े है वहां भी यही तो हुए था पर कभी इंसान के दिमाग में नहीं आता है हमें क्या मिलता है जिन्होंने दंगा किया है अगर नुकसान के अलावा फायदा हुआ हो तो बताओ ।

इन दंगो से फैली अक्रोषता व्यक्ति के दिमाग में लोगो के प्रति हमेशा एक विभेद पैदा कार देती है जिसकी वजह से लोग हमेशा एक दूसरे का नुक़सान देखते है । 

आज धर्म और जाति मानव कि परिभाषा को खत्म करते जा रहे है । मानवता , नैतिकता और अनेक शीलगुण आपको यदा कदा ही देखने को मिलेगा उसमे भी लोगो स्वार्थ छिपा होता है उसके दिमाग में ये कभी नहीं रहता कि में एक जरूरत मंद कि मदद कर रहा हूं वो तो ये सोचता है कि उपकार कर रहा है ।

आदिमानव काल से आज तक मानव बहुत बदल गया है आज वही मानव इतना सक्षम हो गया है वह प्रकृति के नियमों तक चुनौती देने लगा है । 

ये कोई गलत बात नहीं है पर हमें वो बातें भूल जनी चाहिए जो हमारे पूर्वज द्वारा बनाई गई एक ऐसे संरचना थी जो पूर्णता प्रकृति पर आधारित थी जिससे हमें कभी किसी तरह का नुक़सान नहीं होने वाला था ।

हम तो उसे परिष्कृत करना था ना कि बदलना था ।

आज तो मानव मानवता के अलावा सब कुछ करता है 

वह अब धर्म के लिए जीने लगा है लेकिन कहो उससे धर्म की परिभाषा पता हो तो नहीं पता है जो कि उसे बचपन से बताया जाता है कि ' कर्म ही धर्म है ' ।

आज तो उसके मन हर व्यक्ति के समान विचार रहते है चाहे वो जो भी हो।

कभी कभी ये लगता है इतना सभ्य मानव हमेशा असभ्य कृत क्यूं करता है ? क्या एक ही उद्देश्य है बर्बादी और सिर्फ बर्बादी?

 

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